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जापान में आई विपदा में ईश्वर सभी जापानी बंधुओं की मदद करें.!!

ज़िंदगी बदल रही है !!

जब मैं छोटा था शायद ज़िंदगी बदल रही है!! जब मैं छोटा था, शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी.. मुझे याद है मेरे घर से “स्कूल” तक का वो रास्ता, क्या क्या नहीं था वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ, अब वहां “मोबाइल शॉप”, “विडियो पार्लर” हैं, फिर भी सब सूना है.. शायद अब दुनिया सिमट रही है… जब मैं छोटा था, शायद शामें बहुत लम्बी हुआ करती थीं… मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े, घंटों उड़ा करता था, वो लम्बी “साइकिल रेस”, वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना, अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है. शायद वक्त सिमट रहा है.. जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी, दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना, वो लड़कियों की बातें, वो साथ रोना… अब भी मेरे कई दोस्त हैं, पर दोस्ती जाने कहाँ है, जब भी “traffic signal” पे मिलते हैं “Hi” हो जाती है, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं, होली, दीवाली, जन्मदिन, नए साल पर बस SMS आ जाते हैं, शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं.. जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे, छु...

मधुशाला - madhushala

॥हरिवंश राय बच्चन कृत मधुशाला॥ मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला पहले भोग लगा लूँ तेरा, फ़िर प्रसाद जग पाएगा सबसे पहले तेरा स्वागत, करती मेरी मधुशाला॥१॥ प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूणर् निकालूँगा हाला एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका आज निछावर कर दूँगा मैं, तुझपर जग की मधुशाला॥२॥ भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला कभी न कण- भर ख़ाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला॥३॥ मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला ' किस पथ से जाऊँ? ' असमंजस में है वह भोलाभाला अलग- अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ - ' राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला॥४॥ चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला! ' दूर अभी है ' , पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला हिम्मत है न बढ़ूँ आगे, साहस है न फ़िरूँ पीछे किंकतर्व्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला॥५॥ मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, ...

नीड़ का निर्माण फिर फिर - Need ka nirman fir fir

यह कविता मुझे हमेशा उर्जा देती हाय : नीड़ का निर्माण फिर फिर, नेह का आह्वान फिर फिर यह उठी आंधी की नभ में छा गया सहसा अँधेरा धुलिधुसर बादलों ने धरती को इस भाँती घेरा रात सा दिन हो गया फिर रात आई और काली लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा रात के उत्पात-भय से भीत जन जन भीत कण कण किन्तु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर नीड़ का निर्माण फिर फिर ..... क्रुद्ध नभ के वज्रदंतो में उषा है मुस्कुराती घोर-गर्जनमय गगन ने कंठ में खग-पंक्ति गाती एक चिडिया चोंच में तिनका लिए जो जा रही हैं वह सहज में ही पवन उनचास को नीचा दिखाती नाश के भय से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख प्रलय की निस्तब्धता में सृष्टि का नवगान फिर फिर नीड़ का निर्माण फिर फिर.... - हरिवंशराय बच्चन

बाबा राम देव - सही या गलत ??

बाबा राम देव के भ्रष्टाचार विरोध और काले धन के वापसी के आन्दोलन पर बहुत लोगों की राय है की एक सन्यासी को राजनीतिक पैंतरों से दूर रहना चाहिए. शायद दूसरी दुनिया में रहने वाले ये लोग भारतीय सन्यासी परंपरा के बारे में नितांत अपरिचित है. और शायद ये सन्यासियों को गुफा कन्दरा में रहने वाला जीव समझते है?. एसे सब लोगो से मेरा एक ही विनम्र अनुरोध है के समग्रता से स्वामी विवेकानंद को पड़े. तब उनको समझ में ए गा की सन्यास परंपरा का उदय ही इन्ही कार्यों के लिए हुआ था. एक सन्यासी जो अपने पराये के प्रपंचो दूर है. उससे अधिक लोक मंगल कौन शोंच सकलता है? और महाकवि तुलसीदास को मने तो "संत वही जो लोक मंगल के लिए व्यग्र हो' क्या स्वामी रामदेव जी की यह व्यग्रता लोक मंगल के लिए नहीं है?? क्या कला धन वापस आया तो सिर्फ उन्हें व्यक्तिगत लाभ होगा? क्या भ्रष्टाचारियों से उनकी निजी दुश्मनी है?? भगवन स्वामी राम देव को उनके मार्ग में अनंत शक्तियों से उनको आप्लावित करें. और हम सब लोगो को सदबुधि दें.  महेश. 

क्या कांग्रेस भ्रष्टआचार खत्म करने के लिए संकल्पित है???

शायद यह सबसे बड़ा प्रश्न है जिसका उत्तर देना कोई कंग्रेस्सी नहीं चाहता. भारतीय इतिहास के सबसे कमजोर और निकम्मे प्रधान मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह जे भारत और उसकी जनता के लिए कांग्रेस द्वारा थोपी गयी विडम्बना रहे है. अगर मनमोहन सर्कार भ्रस्ताचार के मुद्दे और काले धन के मुद्दे पर इतनी ही संकल्प बद्ध है तो योग ऋषी बाबा राम देव जी का विरोध क्यों??उन्होंने तो अपने किसी भी आयोजन में भ. ज. प्. का नाम तक नहीं लिया है. उनका एक मात्र विरोध बड़ते भ्रष्टाचार और काले धन की वापसी को लेकर है. पर इस पर कांग्रेस को मिर्च क्यों कर लग रही है?? शायद इसी लिए क्योंकि वे सारे कालाबाजारी या तो कंग्रेस्सी है या फिर कांग्रेस की च्च्त्रछाया में है. मनमोहन जी  को  अगर प्रधानमंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद मिला तो यह देश का सौभाग्य नहीं बल्कि उनका सौभाग्य था की देश ने उनको चुना. किन्तु यह घोर विडम्बना थी जिसकी मार हम लम्बे अरसे तक झेलें गे.  बहुत निस्तेज और कबूतरी चेहरे वाले मनमोहन सिंह जी को देख कर मन में घोर अवसाद पैदा होता है... आखिर सरवोछ पद पर आसीन यह व्यक्ति देश को किस दिशा में ले जा रहा है?? इतिह...
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ईसवी सन २०११ की हार्दिक शुभ कामनाएं !!!