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नीड़ का निर्माण फिर फिर - Need ka nirman fir fir

यह कविता मुझे हमेशा उर्जा देती हाय : नीड़ का निर्माण फिर फिर, नेह का आह्वान फिर फिर यह उठी आंधी की नभ में छा गया सहसा अँधेरा धुलिधुसर बादलों ने धरती को इस भाँती घेरा रात सा दिन हो गया फिर रात आई और काली लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा रात के उत्पात-भय से भीत जन जन भीत कण कण किन्तु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर नीड़ का निर्माण फिर फिर ..... क्रुद्ध नभ के वज्रदंतो में उषा है मुस्कुराती घोर-गर्जनमय गगन ने कंठ में खग-पंक्ति गाती एक चिडिया चोंच में तिनका लिए जो जा रही हैं वह सहज में ही पवन उनचास को नीचा दिखाती नाश के भय से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख प्रलय की निस्तब्धता में सृष्टि का नवगान फिर फिर नीड़ का निर्माण फिर फिर.... - हरिवंशराय बच्चन