Saturday, May 21, 2016

मौन शाश्त्रार्थ


कई शताब्दियों पहले इटली में पोप ने यह आदेश दिया कि सभी यहूदी कैथोलिक में परिवर्तित हो जाएं अन्यथा इटली छोड़ दें. यह सुनकर यहूदी समुदाय में बहुत रोष व्याप्त हो गया. ऐसे में पोप ने उन्हें समझौते की पेशकश करते हुए शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया. यदि यहूदी जीत जाते तो वे इटली में रह सकते थे, और यदि पोप जीत जाता तो यहूदियों को कैथोलिक बनना पड़ता या इटली छोड़ना होता.
यहूदियों के सामने कोई विकल्प नहीं था. उन्होंने शास्त्रार्थ के लिए उपयुक्त व्यक्ति के नाम पर विचार... किया लेकिन कोई इसके लिए आगे नहीं आया. विद्वान पोप के साथ शास्त्रार्थ करना आसान न था. अंततः यहूदियों ने मोइशे नामक एक ऐसे व्यक्ति को चुन लिया जो हमेशा ही दूसरों की जगह पर काम करने के लिए तैयार हो जाता था. बूढ़ा और गरीब होने के नाते उसके पास खोने के लिए कुछ न था इसलिए वह तैयार हो गया. उसने सिर्फ एक शर्त रखी कि शास्त्रार्थ केवल संकेतों के माध्यम से हो क्योंकि वह साफ-सफाई का काम करने का नाते बातें करने का आदी नहीं था. पोप इसके लिए राजी हो गया.
शास्त्रार्थ के दिन पोप और मोइशे आमने-सामने बैठे. पोप ने अपना हाथ उठाकर तीन उंगलियां दिखाईं. मोइशे ने अपने उत्तर में हाथ उठाकर एक उंगली दिखाई. फिर पोप ने अपने सिर के चारों ओर उंगली घुमाई. इसके जवाब में मोइशे ने उंगली से जमीन की ओर इशारा किया. पोप ने भोज प्रसाद और मदिरा का कप उठाया. यह देखकर मोइशे ने एक सेब निकाल कर दिखाया.
यह देखकर पोप अपनी गद्दी से उतर गया और उसने स्वयं को पराजित घोषित करके कहा कि मोइशे वाकई अत्यंत ज्ञानी है. अब यहूदी इटली में निर्बाध रह सकते थे.
बाद में कार्डिनल पादरियों के साथ बैठक में उन्होंने पोप से पूछा कि शास्त्रार्थ में क्या घटा. पोप ने कहा, ‘पहले मैंने तीन उंगलियों से पवित्र त्रिमूर्ति की ओर इशारा किया. मोइशे ने इसके उत्तर में एक उंगली उठाकर बताया कि हमारी आस्था के केंद्र में मात्र एक ही ईश्वर है. फिर मैंने अपने सिर के चारों ओर उंगली घुमाकर बताया कि ईश्वर हमारे चारों ओर है. मोइशे ने जमीन की ओर इशारा करके कहा कि ईश्वर हमारे साथ यहां इसी क्षण मौजूद है. मैंने भोज प्रसाद और मदिरा का कप दिखाकर बताया कि परमेश्वर सारे पापों से हमारा उद्धार करता है, और मोइशे ने सेब दिखाकर सर्वप्रथम आद्य पाप का स्मरण कराया, जिससे मुक्ति संभव नहीं है. इस तरह उसने हर सवाल पर मुझे मात दी और मैं शास्त्रार्थ जारी नहीं रख सका.
उसी दौरान यहूदी समुदाय में लोग बूढ़े मोइशे से यह पूछने के लिए जमा हुए कि वह शास्त्रार्थ में कैसे जीत गया. ‘मुझे खुद नहीं पता,’ मोइशे ने कहा. ‘पहले उसने मुझे बताया कि हमें तीन दिनों में इटली छोड़ना होगा. इसके जवाब मे मैंने कहा कि एक भी यहूदी इटली छोड़कर नहीं जाएगा. फिर उसने इशारे से कहा कि पूरा इटली यहूदियों से रिक्त कर देगा. इसके जबाव में मैंने जमीन की ओर इशारा करके कहा कि हम यहीं रहेंगे और टस-से-मस नहीं होंगे.’
‘फिर क्या हुआ?’, एक औरत ने पूछा.
‘होना क्या था!’, मोइशे ने कहा, ‘उसने अपना भोजन दिखाया और मैंने अपना खाना निकाल लिया.’

बुद्ध और बुद्धत्व

बहुत सारे लोग गर्व कर रहे हैं कि उन्होने बुद्ध को गले लगा लिया. कुछ इसलिये भी खुश हैं कि उन्होने अंतत हिंदुत्व और हिंदू धर्म को लात मार दी है. प्रतिकार का आनंद...
भाई मेरे ठहरो! रुको! बताओ !!!
बुद्ध को कितना जाना? कितना समझा बुद्ध और बुद्धत्व को? कितना समझा कि आखिर ज्ञान क्या है? प्रज्ञा को कितना जाना?
...
फिर बताओ
जो बुद्ध को जान गया, उसमें कैसा गर्व? उस व्यक्ति में प्रतिकार का सुख कैसे? उसमें चिढ की भावना क्यों? आपको नहीं पता? बुद्धत्व में ना तो गर्व करने जैसा कुछ है और ना ही लात मारने जैसी कोई सीख.उसमें तो बस एक ही सीख है- ‪#‎प्रेम‬...
बुद्ध से किस जन्म की दुश्मनी निकाल रहे हो साधो...
____________________
‪#‎सब्बं_मंगलम्_जानते_हो‬ ?
Sarika Tiwari ji

वामपंथी शोर


सन 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए जब नरेन्द्र मोदी को प्रधानमन्त्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा था तब वामपंथी शोर मचा रहे थे कि भाजपा में आडवाणी, जोशी जैसे बु...जुर्गों को अपमानित किया जा रहा है, इन्हीं वामपंथियों ने आज जब केरल में वी एस अच्युतानंदन की मुख्यमन्त्री पद की दावेदारी को यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि उनकी उम्र अधिक होने के कारण उन्हें मुख्यमन्त्री नहीं बनाया जा सकता। अब कोई हो हल्ला नहीं कोई चर्चा नहीं कि दक्षिणी राज्यों में वामपंथ को खड़ा करने वाले अच्युतानंदन के साथ यह अन्याय क्यों?

Sunday, March 24, 2013

मोदी विकल्प हैं या आशा की किरण ?

प्रश्न बड़ा है. आज के माहौल में मोदी जी बढ़ती  लोकप्रियता और सर्वमान्यता खास करके आज के माहौल में सबसे ज्यादा निराश नजर आने वाले युवावों के बीच उनकी लोक प्रियता काँग्रेस के लिए चिंता का सबब है. कुछ लोग मोदी को आज के माहौल में एक विकल्प बताकर उनको थोडा कमतर करने की कोशिस करते है. हालाँकि यह भी दृष्टव्य है की मोदी लगातार मीडिया और तथा कथित बुद्धिजीवियो के जबरदस्त आलोचना के शिकार पिछले बारह सालों से है.


                                                                  गुजरात उनके द्वारा किया गया जबरदस्त कम और उनकी एक दमदार प्रशासक वाली छबि उनको आज के माहौल में आशा की एक किरण बनाती है. न की एक विकल्प. मोदी ने बातें नहीं की है. और शायद वे करते तो कोई सुनता भी नहे क्योंकि माहौल हमेश उनके लिए पूर्वाग्रही रहा है. उन्होंने कम करके उदहारण प्रस्तुत किये है. और इसकी मिसाल सिर्फ सरकारी डाटा नहीं है बल्कि हर गुजरात यात्री का अपना अनुभव है.  मई स्वयं मोदी जी के गुजरात में तीन साल रहा  और उनके कम का कायल हूँ। उन्होंने सिर्फ बातें या वादे नहीं किये बल्कि गुजरात की जनता को यह महसूस करवाया की कुशल प्रशासन क्या होता है.

आज के निराशा भरे  माहौल में निश्चय मोदी जी आशा की किरण है. वे प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं और प्रधानमंत्री के रूप में इतने ही लोकप्रिय रहेंगे की नहीं फिलहाल यह तो समय के गर्भ में है. पर यह सच है की देश आज मोदी में अपना भविष्य देख रहा है.

Tuesday, October 23, 2012




आप सब को दशहरा एवं दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाई !!    प्रार्थना करता हूँ की माँ दुर्गा सभी भ्रष्टाचारियों का सर्वनाश करें !! देश का कल्याण हो !!


Sunday, July 29, 2012

नेतृत्व का अकाल ??

क्या भारत इस समय नेतृत्व का  अकाल झेल रहा है ? क्या कोई शसक्त और सछम व्यक्ति आपको सम्पूर्ण राजनैतिक परिवेश में नजर आ रहा है ? जो भारत को आने वाले वर्षों में दशा और दिशा दे पायेगा ? यह प्रश्न आज की परिस्थितियों में भारत के सामने यक्ष प्रश्न है. आज  हम भारत के राजनितिक पटल पर देखते हैं तो निराशा और धुंध की मिलीजुली तस्वीर दिखती है. कौन सी समस्या है जो इस समय भारत के सामने इस समय न हो? देश की सीमाओं की सुरक्षा की समस्या, गृह सुरक्षा, नक्सल वाद, आतंक वाद आर्थिक बदहाली और लगातार बढती महंगाई तो लगातार चर्चा  में रहने वाले मुद्दे है।

                     ये प्रश्न ज्यादा गंभीर है। रोजी रोटी की समस्या से भी ज्यादा. क्योंकि हर समस्या जिससे देश जूझ रहा है वो सब जाकर नेतृत्व की कसौटी है। क्या मुलायम में आपको भविष्य का प्रधान मंत्री दीखता है? मायावती, राहुल गांधी, चिदंबरम या फिर और न जाने कितने नाम काया कोई भी आपके मन में बिस्वास जागते है की ये देश के समक्ष खड़ी समस्यायों का समाधान दे ? 

                                                             या फिर मनमोहन सिंह को ये क और अवसर देंगे ? सोंचिये ........................

Sunday, March 18, 2012

रेल की राजनीती !!

भारतीय रेल पिछले ८ सालों से राजनीती के घनचक्कर में फंसी हुई है. किराया पिछले ८ सालों में नहीं बढाया गया है. सुरक्षा की हालत दयनीय है. सुबिधाओं के नाम पर कुछ नहीं है. बजट के नाम पर प्रति वर्ष की जारही कोरी घोस्नाएं है.
                                हम किस बिश्वस्तारिये रेल परिवहन की बात कर रहे है?? क्या रेल की हालत इस तरह के स्वार्थ प्रेरित और वोट  बैंक आधारित राजनीती से सुधारी जा सकती है?
                                 मै पूंछता हूँ की आम जन लोगों में कितने प्रतिशत येसेलोग होंगे जो किराया बडाये जाने का बिरोध करेंगे....भले ही सुरक्षा के नाम पर उनके जान पर बनी रहे...??? कौन होगा जो अतिरिक्त प्रभार न देना चाहेगा भले सीट पर कोक्रोछ दौड़ते रहें?? कौन होगा जो बढे हुए शुल्क की वापसी चाहेगा भले वासी और सडा हुआ खाना मिलता रहे??

                                            किराये बढे किन्तु सुबिधाये भी, हमारी जेब कटे पर रेल बिस्वस्तारिये हो....कम से कम यात्रा को सीट मिले !! सुरक्षा क आश्वासन तो मिले .......

पर क्या भारत में कभी एसा होगा.......