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मौन शाश्त्रार्थ

कई शताब्दियों पहले इटली में पोप ने यह आदेश दिया कि सभी यहूदी कैथोलिक में परिवर्तित हो जाएं अन्यथा इटली छोड़ दें. यह सुनकर यहूदी समुदाय में बहुत रोष व्याप्त हो गया. ऐसे में पोप ने उन्हें समझौते की पेशकश करते हुए शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया. यदि यहूदी जीत जाते तो वे इटली में रह सकते थे, और यदि पोप जीत जाता तो यहूदियों को कैथोलिक बनना पड़ता या इटली छोड़ना होता. यहूदियों के सामने कोई विकल्प नहीं था. उन्होंने शास्त्रार्थ के लिए उपयुक्त व्यक्ति के नाम पर विचार ... किया लेकिन कोई इसके लिए आगे नहीं आया. विद्वान पोप के साथ शास्त्रार्थ करना आसान न था. अंततः यहूदियों ने मोइशे नामक एक ऐसे व्यक्ति को चुन लिया जो हमेशा ही दूसरों की जगह पर काम करने के लिए तैयार हो जाता था. बूढ़ा और गरीब होने के नाते उसके पास खोने के लिए कुछ न था इसलिए वह तैयार हो गया. उसने सिर्फ एक शर्त रखी कि शास्त्रार्थ केवल संकेतों के माध्यम से हो क्योंकि वह साफ-सफाई का काम करने का नाते बातें करने का आदी नहीं था. पोप इसके लिए राजी हो गया. शास्त्रार्थ के दिन पोप और मोइशे आमने-सामने बैठे. पोप ने अपना हाथ उठाकर तीन उं...

बुद्ध और बुद्धत्व

बहुत सारे लोग गर्व कर रहे हैं कि उन्होने बुद्ध को गले लगा लिया. कुछ इसलिये भी खुश हैं कि उन्होने अंतत हिंदुत्व और हिंदू धर्म को लात मार दी है. प्रतिकार का आनंद... भाई मेरे ठहरो! रुको! बताओ !!! बुद्ध को कितना जाना? कितना समझा बुद्ध और बुद्धत्व को? कितना समझा कि आखिर ज्ञान क्या है? प्रज्ञा को कितना जाना? ... फिर बताओ जो बुद्ध को जान गया, उसमें कैसा गर्व? उस व्यक्ति में प्रतिकार का सुख कैसे? उसमें चिढ की भावना क्यों? आपको नहीं पता? बुद्धत्व में ना तो गर्व करने जैसा कुछ है और ना ही लात मारने जैसी कोई सीख.उसमें तो बस एक ही सीख है- ‪#‎ प्रेम‬ ... बुद्ध से किस जन्म की दुश्मनी निकाल रहे हो साधो... ____________________ ‪#‎ सब्बं_मंगलम्_जानते_हो‬ ? Sarika Tiwari ji

वामपंथी शोर

सन 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए जब नरेन्द्र मोदी को प्रधानमन्त्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा था तब वामपंथी शोर मचा रहे थे कि भाजपा में आडवाणी, जोशी जैसे बु ... जुर्गों को अपमानित किया जा रहा है, इन्हीं वामपंथियों ने आज जब केरल में वी एस अच्युतानंदन की मुख्यमन्त्री पद की दावेदारी को यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि उनकी उम्र अधिक होने के कारण उन्हें मुख्यमन्त्री नहीं बनाया जा सकता। अब कोई हो हल्ला नहीं कोई चर्चा नहीं कि दक्षिणी राज्यों में वामपंथ को खड़ा करने वाले अच्युतानंदन के साथ यह अन्याय क्यों?

मोदी विकल्प हैं या आशा की किरण ?

प्रश्न बड़ा है. आज के माहौल में मोदी जी बढ़ती  लोकप्रियता और सर्वमान्यता खास करके आज के माहौल में सबसे ज्यादा निराश नजर आने वाले युवावों के बीच उनकी लोक प्रियता काँग्रेस के लिए चिंता का सबब है. कुछ लोग मोदी को आज के माहौल में एक विकल्प बताकर उनको थोडा कमतर करने की कोशिस करते है. हालाँकि यह भी दृष्टव्य है की मोदी लगातार मीडिया और तथा कथित बुद्धिजीवियो के जबरदस्त आलोचना के शिकार पिछले बारह सालों से है.                                                                   गुजरात उनके द्वारा किया गया जबरदस्त कम और उनकी एक दमदार प्रशासक वाली छबि उनको आज के माहौल में आशा की एक किरण बनाती है. न की एक विकल्प. मोदी ने बातें नहीं की है. और शायद वे करते तो कोई सुनता भी न...
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आप सब को दशहरा एवं दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाई !!    प्रार्थना करता हूँ की माँ दुर्गा सभी भ्रष्टाचारियों का सर्वनाश करें !! देश का कल्याण हो !!

नेतृत्व का अकाल ??

क्या भारत इस समय नेतृत्व का  अकाल झेल रहा है ? क्या कोई शसक्त और सछम व्यक्ति आपको सम्पूर्ण राजनैतिक परिवेश में नजर आ रहा है ? जो भारत को आने वाले वर्षों में दशा और दिशा दे पायेगा ? यह प्रश्न आज की परिस्थितियों में भारत के सामने यक्ष प्रश्न है. आज  हम भारत के राजनितिक पटल पर देखते हैं तो निराशा और धुंध की मिलीजुली तस्वीर दिखती है. कौन सी समस्या है जो इस समय भारत के सामने इस समय न हो? देश की सीमाओं की सुरक्षा की समस्या, गृह सुरक्षा, नक्सल वाद, आतंक वाद आर्थिक बदहाली और लगातार बढती महंगाई तो लगातार चर्चा  में रहने वाले मुद्दे है।                      ये प्रश्न ज्यादा गंभीर है। रोजी रोटी की समस्या से भी ज्यादा. क्योंकि हर समस्या जिससे देश जूझ रहा है वो सब जाकर नेतृत्व की कसौटी है। क्या मुलायम में आपको भविष्य का प्रधान मंत्री दीखता है? मायावती, राहुल गांधी, चिदंबरम या फिर और न जाने कितने नाम काया कोई भी आपके मन में बिस्वास जागते है की ये देश के समक्ष खड़ी समस्यायों ...

रेल की राजनीती !!

भारतीय रेल पिछले ८ सालों से राजनीती के घनचक्कर में फंसी हुई है. किराया पिछले ८ सालों में नहीं बढाया गया है. सुरक्षा की हालत दयनीय है. सुबिधाओं के नाम पर कुछ नहीं है. बजट के नाम पर प्रति वर्ष की जारही कोरी घोस्नाएं है.                                 हम किस बिश्वस्तारिये रेल परिवहन की बात कर रहे है?? क्या रेल की हालत इस तरह के स्वार्थ प्रेरित और वोट  बैंक आधारित राजनीती से सुधारी जा सकती है?                                  मै पूंछता हूँ की आम जन लोगों में कितने प्रतिशत येसेलोग होंगे जो किराया बडाये जाने का बिरोध करेंगे....भले ही सुरक्षा के नाम पर उनके जान पर बनी रहे...??? कौन होगा जो अतिरिक्त प्रभार न देना चाहेगा भले सीट पर कोक्रोछ दौड़ते रहें?? कौन होगा जो बढे ...