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नेतृत्व का अकाल ??

क्या भारत इस समय नेतृत्व का  अकाल झेल रहा है ? क्या कोई शसक्त और सछम व्यक्ति आपको सम्पूर्ण राजनैतिक परिवेश में नजर आ रहा है ? जो भारत को आने वाले वर्षों में दशा और दिशा दे पायेगा ? यह प्रश्न आज की परिस्थितियों में भारत के सामने यक्ष प्रश्न है. आज  हम भारत के राजनितिक पटल पर देखते हैं तो निराशा और धुंध की मिलीजुली तस्वीर दिखती है. कौन सी समस्या है जो इस समय भारत के सामने इस समय न हो? देश की सीमाओं की सुरक्षा की समस्या, गृह सुरक्षा, नक्सल वाद, आतंक वाद आर्थिक बदहाली और लगातार बढती महंगाई तो लगातार चर्चा  में रहने वाले मुद्दे है।                      ये प्रश्न ज्यादा गंभीर है। रोजी रोटी की समस्या से भी ज्यादा. क्योंकि हर समस्या जिससे देश जूझ रहा है वो सब जाकर नेतृत्व की कसौटी है। क्या मुलायम में आपको भविष्य का प्रधान मंत्री दीखता है? मायावती, राहुल गांधी, चिदंबरम या फिर और न जाने कितने नाम काया कोई भी आपके मन में बिस्वास जागते है की ये देश के समक्ष खड़ी समस्यायों ...

रेल की राजनीती !!

भारतीय रेल पिछले ८ सालों से राजनीती के घनचक्कर में फंसी हुई है. किराया पिछले ८ सालों में नहीं बढाया गया है. सुरक्षा की हालत दयनीय है. सुबिधाओं के नाम पर कुछ नहीं है. बजट के नाम पर प्रति वर्ष की जारही कोरी घोस्नाएं है.                                 हम किस बिश्वस्तारिये रेल परिवहन की बात कर रहे है?? क्या रेल की हालत इस तरह के स्वार्थ प्रेरित और वोट  बैंक आधारित राजनीती से सुधारी जा सकती है?                                  मै पूंछता हूँ की आम जन लोगों में कितने प्रतिशत येसेलोग होंगे जो किराया बडाये जाने का बिरोध करेंगे....भले ही सुरक्षा के नाम पर उनके जान पर बनी रहे...??? कौन होगा जो अतिरिक्त प्रभार न देना चाहेगा भले सीट पर कोक्रोछ दौड़ते रहें?? कौन होगा जो बढे ...

self-confidence !!

The business executive was deep in debt and could see no way out. Creditors were closing in on him. Suppliers were demanding payment. He sat on the park bench, head in hands, wondering if anything could save his company from bankruptcy.      Suddenly an old man appeared before him. "I can see that something is troubling you," he said. After listening to the executive's woes, the old man said, "I believe I can help you."      He asked the man his name, wrote out a check, and pushed it into his hand saying, "Take this money. Meet me here exactly one year from today, and you can pay me back at that time." The business executive saw in his hand a check for $500,000, signed by John D. Rockefeller, then one of the richest men in the world!      "I can erase my money worries in an instant!" he realized. But instead, the executive decided to put the un-cashed check in his safe. Just knowing it was there might give him the strength to w...

आदम गोंडवी को नमन !!!

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हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये ... ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़ दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये
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 सदा बहार, अत्तयंत सकारात्मक सोंच वाले, तथा सिनेमाई जगत में अपनी एक अलग शैली के लिए मशहूर अभिनेता देव आनंद साहब नहीं रहे. उनकी फिल्मे जहाँ एक ओरे उनके बेमिशाल अभिनय  के लिए जानी जाती है वही दूसरी और मनमोहक गीत के लिए भी. भगवन उनको शांति दे और परिवार वालों को इस शोक्दायी पल से उबरने की शक्ती दे.

हिटलर के अनुभव भारतीय सन्दर्भों में !!

हिटलर की जीवनी "मेरा संघर्ष" पढ़ी उसके बहुत सारे अनुभव भारतीय सन्दर्भों एकदम फिट बैठते है. संसदिये लोकतंत्र के बारे में उसकी एक टिप्पणी देखें "संसदिये प्रणाली में ऊपर बैठा नेता यह जनता है दुबारा पदासीन होने का मौका मिले न मिले अतः वह कुर्सी से चिपकने के सरे तिकड़म आजमाता है, वहीं दूसरी तरफ नीचे के नेता गन उसको महा धूर्त, तिकडमी, पद लोभी आदि कहते है और किसे भी तरह उसको पद्चुत करने और अपना मार्ग प्रशस्त करने में लगे रहते है. एसे में जनहित, देशहित आदि सिर्फ शब्दालंकार बन कर रह जाते है. सही मायने में कोई जनप्रतिनिधि न होकर अपना ही हित साधने में लगे रहते है....."                                 भारतीय सन्दर्भ में कितना सच है उसका अनुभव. संसदिये लोकतंत्र के औचित्य पर एक बहस हो सकती है. और हिटलर का उपरोक्त अनुभावोप्रांत किया गया कार्य अनुचित हो सकता है. तो भी क्या हम उपरोक्त बैटन की सत्यता से इंकार कर सकते है......मीडिया से सम्बंधित एसी ही...

मैं नीर भरी दुख की बदली!

मैं नीर भरी दुख की बदली! स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा क्रन्दन में आहत विश्व हँसा नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झारिणी मचली! मेरा पग-पग संगीत भरा श्वासों से स्वप्न-पराग झरा नभ के नव रंग बुनते दुकूल छाया में मलय-बयार पली। मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल चिन्ता का भार बनी अविरल रज-कण पर जल-कण हो बरसी, नव जीवन-अंकुर बन निकली! पथ को न मलिन करता आना पथ-चिह्न न दे जाता जाना; सुधि मेरे आगन की जग में सुख की सिहरन हो अन्त खिली! विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना, इतिहास यही- उमड़ी कल थी, मिट आज चली!