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हिटलर के अनुभव भारतीय सन्दर्भों में !!

हिटलर की जीवनी "मेरा संघर्ष" पढ़ी उसके बहुत सारे अनुभव भारतीय सन्दर्भों एकदम फिट बैठते है. संसदिये लोकतंत्र के बारे में उसकी एक टिप्पणी देखें "संसदिये प्रणाली में ऊपर बैठा नेता यह जनता है दुबारा पदासीन होने का मौका मिले न मिले अतः वह कुर्सी से चिपकने के सरे तिकड़म आजमाता है, वहीं दूसरी तरफ नीचे के नेता गन उसको महा धूर्त, तिकडमी, पद लोभी आदि कहते है और किसे भी तरह उसको पद्चुत करने और अपना मार्ग प्रशस्त करने में लगे रहते है. एसे में जनहित, देशहित आदि सिर्फ शब्दालंकार बन कर रह जाते है. सही मायने में कोई जनप्रतिनिधि न होकर अपना ही हित साधने में लगे रहते है....."                                 भारतीय सन्दर्भ में कितना सच है उसका अनुभव. संसदिये लोकतंत्र के औचित्य पर एक बहस हो सकती है. और हिटलर का उपरोक्त अनुभावोप्रांत किया गया कार्य अनुचित हो सकता है. तो भी क्या हम उपरोक्त बैटन की सत्यता से इंकार कर सकते है......मीडिया से सम्बंधित एसी ही...

मैं नीर भरी दुख की बदली!

मैं नीर भरी दुख की बदली! स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा क्रन्दन में आहत विश्व हँसा नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झारिणी मचली! मेरा पग-पग संगीत भरा श्वासों से स्वप्न-पराग झरा नभ के नव रंग बुनते दुकूल छाया में मलय-बयार पली। मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल चिन्ता का भार बनी अविरल रज-कण पर जल-कण हो बरसी, नव जीवन-अंकुर बन निकली! पथ को न मलिन करता आना पथ-चिह्न न दे जाता जाना; सुधि मेरे आगन की जग में सुख की सिहरन हो अन्त खिली! विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना, इतिहास यही- उमड़ी कल थी, मिट आज चली!

संघ से भयभीत टीम अन्ना ?

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कभी अन्ना कहते है की वे संघ के किसी पदाधिकारी का नाम तक नहीं जानते, और संघ का कोई कार्य करता उनके आन्दोलन में शामिल नहीं था. कभी कश्मीर मुद्दे पर तमाचा खा चुके प्रशांत कहते है की संघ उन्हें समर्थन दे इस्ससे उन्हें परहेज है.....और फिर कहते है की परहेज नहीं है... प्रश्न यह है की अन्ना का आन्दोलन राष्ट्रीय है या वैक्तिक? क्या संघी विचारधारा के लोग भारतीय नागरिक नहीं है? और यदि अन्ना राष्ट्रीय आन्दोलन चला रहे है तो कौन संघी है कौन बजरंगी है, कौन भाजपाई कौन कांग्रेसी?? कोई भी व्यक्ति पहले भारतीये है, पहले राष्ट्र का है बाद में किसी पार्टी या बिचारधरा का. और इस हिसाब से संघ या किसी अन्य संघटन के कार्य करता का पूरा अधिकार है की वे किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे के आन्दोलन में भाग लें और कार्य करें. यदि अन्ना या उनकी टीम ये समझती है की संघ से अपरिचय दिखा कर वे किसे उजले कुरते वाली जमात में बने रहेंगे तो वे भयानक भूल की तरफ है....और निश्चय ही आत्म प्रवंचन और भटकाव की तरफ बढ़ रहे है..... राष्ट्रीय आन्दोलन कभी भी जाती सम्प्रदाए या वैक्तिक वैचारिक सीमावो  से बांध कर नह...

पर उपदेश कुशल बहुतेरे........

आज के हालात पर  ओशो का कथन, मालूम नहीं कहाँ पढ़ा था, स्मरण हो रहा है ..."इतनी भक्ती, इतनी पूजा, इतने यात्राये, इतने घनघोर प्रवचन, इतने सम्प्रदाए और सन्यासी.......फिर इतनी अशांति, इतना अनाचार, दुराचार, भ्रस्ताचार, व्यभिचार, इतना पाप.......या तो हमरी प्रार्थनाएं सच्ची नहीं है या फिर ईस्वर का अस्तित्त्व ही नहीं है......." कितना सार्थक है...                                                                       टी. वी. चैनलों. पर लगातार चल रहे प्रवचन, पञ्च सितारा महात्मा जी और पंडाल ....करोनो अनुयायी.....और देश की  दशा और दिशा ???  हर भ्रस्ता चारी कही न कही तथाकथित महात्माओं का हस्त प्राप्त है....    ...
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शत शत नमन !! भगवन वर्तमान कंग्रेस्सियों को सदबूधी दें .

अन्ना हजारे सही या गलत?

आज अन्ना हजारे से विरोध रखने वाले सबसे ज्यादा अगर किसी बात पर बहस कर रहे है तो  उनके  अनशन के औचित्य पर और उसके सही या गलत होने पर. राहुल गांधी (तथा कथित युवावों के नेता, भारत के भविष्य? कांग्रेसी  चाटुकारों के जबान में) ने तो अन्ना के अनशन को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा करार दे दिया. शायद राहुल गाँधी की समझ लोकतंत्र के बारे में यही है? क्या लोकतंत्र जनांदोलनो से खतरे में पद सकता है? लोक तंत्र किसका है और किसके लिए है? क्या चंद चुने हुए लोग समूची जनता के  भाग्यविधाता हो सकते है? अपनी बात कलो शांति पूर्ण तरीके से व्यक्त करने को क्या राष्ट्र विरोधी और लोक तंत्र विरोधी कहेंगे? शायद राहुल की सोंच यही हो. हो भी क्यों न जिसने गरीबी के दर्शन न किये हो, इतना बड़ा राष्ट्र विरासत(?) में मिल गया हो, अरबों रूपये के ट्रस्ट हो, उसकी सोंच क्या होगी?. राहुल को अपनी सर्कार की डकैती नहीं दिखती, उसपर उनके कोई विचार नहीं है, किसी घोटाले से उनका मन आहत नहीं होता, किसानो के आत्महत्या करने, महगाई के बेतहासा बदने, और गरीबों के निरंतर...

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है / रामधारी सिंह "दिनकर"

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही, जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली, जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली। जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम, "जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।" "सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?" 'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?" मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं, जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में; अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में। लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं, जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती, सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है, जनता की रोके राह,समय में ताव कहां? वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है। अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं; यह और...